👉 गीता का ग्यारहवाँ अध्याय अत्यंत दिव्य और महत्वपूर्ण है। इसमें श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना विश्वरूप (Virat Roop) दिखाते हैं – यानी वह अनंत, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान रूप जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि समाहित है। यह अध्याय भक्तिभाव को चरम पर पहुँचाता है।


मुख्य विषय

1. अर्जुन की प्रार्थना

  • अर्जुन कहते हैं – “हे प्रभु! मैंने आपके उपदेश से ज्ञान प्राप्त कर लिया है। अब कृपा करके मुझे अपना वह विराट रूप दिखाइए, जिसमें मैं आपकी दिव्य विभूतियों का साक्षात दर्शन कर सकूँ।”

2. विश्वरूप का दर्शन

  • श्रीकृष्ण अर्जुन को दिव्य नेत्र प्रदान करते हैं और अपना विराट रूप प्रकट करते हैं।
  • उस रूप में –
    • अनंत मुख और नेत्र हैं।
    • सूर्य, अग्नि और बिजली समान तेज है।
    • पूरा आकाश और पृथ्वी उसमें समाए हुए हैं।
    • देवता, ऋषि और सारे प्राणी उस रूप को देखकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं।

“दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥”

(अध्याय 11, श्लोक 12)

अर्थ – यदि आकाश में सहस्रों सूर्य एक साथ उदित हों, तो भी वह तेज उस महात्मा के विराट रूप के तेज के समान नहीं होगा।


3. अर्जुन की प्रतिक्रिया

  • अर्जुन उस विराट रूप को देखकर विस्मित और भयभीत हो जाते हैं।
  • वे देखते हैं कि सभी योद्धा (भीष्म, द्रोण, कर्ण आदि) उस विराट रूप के अग्नि-समान मुख में प्रवेश कर रहे हैं।
  • अर्जुन समझ जाते हैं कि सबका अंत भगवान की योजना के अनुसार निश्चित है।

4. भगवान का वचन

  • श्रीकृष्ण कहते हैं – “मैं काल (समय) हूँ, लोकों का संहार करने वाला।”
  • युद्ध में पहले से ही सबका नाश निश्चित है, अर्जुन केवल एक निमित्त मात्र है।

“कालोऽस्मि लोकक्षयकृत् प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।”
(अध्याय 11, श्लोक 32)


5. अर्जुन की प्रार्थना और स्तुति

  • अर्जुन भय और भक्ति से काँपते हुए कृष्ण की स्तुति करते हैं।
  • वे क्षमा माँगते हैं क्योंकि उन्होंने कभी मित्रभाव से श्रीकृष्ण को “हे सखा”, “हे यदुवंशी” कहकर संबोधित किया था।

6. भगवान का सौम्य रूप

  • अंत में अर्जुन के निवेदन पर भगवान अपना विराट रूप समेटकर पुनः अपना चारभुजा और फिर दो भुजा वाला सौम्य रूप दिखाते हैं।
  • वे कहते हैं कि इस विराट रूप को न वेदों से, न यज्ञों से, न तपस्या से, न ही दान से देखा जा सकता है।
  • इसे केवल अनन्य भक्ति से ही देखा जा सकता है।

“भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥”

(अध्याय 11, श्लोक 54)


सरल सार (आसान भाषा में)

  • अर्जुन की प्रार्थना पर कृष्ण ने अपना विराट (विश्वरूप) दर्शन कराया।
  • उस रूप में सम्पूर्ण सृष्टि समाहित थी और सब योद्धा उसमें लीन हो रहे थे।
  • भगवान ने कहा – “मैं काल हूँ, सबका संहार करने आया हूँ।”
  • अर्जुन ने भय और भक्ति से भगवान की स्तुति की।
  • अंत में भगवान ने सौम्य रूप दिखाकर कहा कि ऐसा विराट रूप केवल अनन्य भक्ति से ही देखा जा सकता है।