आत्मा अमर है – भगवद गीता की महान शिक्षा

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भूमिका (Introduction)
भगवद गीता का एक गहन और अद्भुत उपदेश है कि “आत्मा न जन्म लेती है और न ही मरती है।”
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि मनुष्य का शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा शाश्वत (Eternal) और अविनाशी (Immortal) है। यही सत्य जीवन और मृत्यु के रहस्य को स्पष्ट करता है।


आत्मा और शरीर का अंतर

गीता कहती है –
👉 शरीर नाशवान है।
👉 आत्मा अविनाशी है।

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जिस प्रकार कपड़े पुराने हो जाने पर मनुष्य नए कपड़े पहनता है, उसी प्रकार आत्मा भी एक शरीर छोड़कर दूसरा शरीर धारण करती है।
यह उपमा गीता में श्लोक (अध्याय 2, श्लोक 22) में दी गई है।


अर्जुन का शोक और कृष्ण का उपदेश

जब अर्जुन अपने परिजनों की मृत्यु की कल्पना से दुखी हुआ, तब कृष्ण ने कहा:
👉 “हे अर्जुन! तू जिनके लिए शोक कर रहा है, वे वास्तव में कभी नष्ट नहीं हो सकते। शरीर नष्ट होता है, लेकिन आत्मा सदा विद्यमान रहती है।”

इससे स्पष्ट है कि मृत्यु केवल शरीर की है, आत्मा की नहीं।

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आत्मा की विशेषताएँ (Qualities of Soul)

  1. अविनाशी (Indestructible) – आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है।
  2. अविकार (Unchangeable) – आत्मा का न जन्म है न मृत्यु।
  3. शाश्वत (Eternal) – आत्मा सदा से है और सदा रहेगी।
  4. सर्वव्यापी (All-pervading) – आत्मा हर जीव में समान रूप से विद्यमान है।

मृत्यु का भय क्यों नहीं होना चाहिए?

गीता सिखाती है कि मृत्यु केवल शरीर का परिवर्तन है। जैसे दिन के बाद रात आती है और फिर सुबह होती है, वैसे ही आत्मा एक शरीर छोड़कर नया शरीर धारण करती है।
👉 यदि आत्मा अमर है, तो मृत्यु से डरने की आवश्यकता नहीं है।


जीवन में इस शिक्षा का महत्व

  1. भय का अंत – आत्मा अमर जानकर मृत्यु का भय कम हो जाता है।
  2. कर्तव्य पालन में शक्ति – जब हम समझते हैं कि आत्मा नष्ट नहीं होती, तो कठिन समय में भी साहस बना रहता है।
  3. आध्यात्मिक उन्नति – यह ज्ञान हमें भौतिक मोह-माया से दूर कर आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।
  4. समानता की भावना – हर जीव में एक ही आत्मा है, इसलिए सबमें ईश्वर का अंश मानकर समान दृष्टि रखनी चाहिए।

आधुनिक दृष्टि से समझना

आज की दुनिया में लोग मृत्यु और हानि से अत्यधिक भयभीत रहते हैं। गीता का यह उपदेश हमें मानसिक संतुलन देता है।

  • यदि कोई प्रियजन संसार छोड़ देता है, तो यह समझकर दुख कम किया जा सकता है कि उसकी आत्मा अभी भी विद्यमान है।
  • यह शिक्षा हमें जीवन में detachment (वैराग्य) और acceptance (स्वीकार्यता) सिखाती है।

प्रेरणादायक उदाहरण

  • स्वामी विवेकानंद कहते थे: “हम आत्मा हैं, जो न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है। मृत्यु तो केवल एक परिवर्तन है।”
  • महात्मा गांधी ने गीता से ही यह आत्मविश्वास लिया कि आत्मा अमर है, इसलिए सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए किसी भी खतरे से न डरना।

आत्मा के अमरत्व को स्वीकार करने का अभ्यास

  1. ध्यान और योग – आत्मा को शरीर से अलग अनुभव करने का साधन।
  2. गीता का अध्ययन – श्लोकों को पढ़ने से आत्मा की गहराई समझ आती है।
  3. नश्वरता को स्वीकारना – हर वस्तु और शरीर अस्थायी है, केवल आत्मा शाश्वत है।
  4. भक्ति मार्ग – आत्मा और परमात्मा के संबंध को समझना।

निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद गीता की तीसरी शिक्षा “आत्मा अमर है” हमें जीवन और मृत्यु के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराती है।
👉 मृत्यु अंत नहीं है, बल्कि आत्मा की यात्रा का नया चरण है।
👉 जो इस सत्य को समझ लेता है, वह न मृत्यु से डरता है और न मोह-माया में फँसता है।

श्रीकृष्ण का संदेश आज भी जीवंत है:
“आत्मा न जन्म लेती है, न मृत्यु को प्राप्त होती है। वह शाश्वत है।”

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