भूमिका (Introduction)
जीवन उतार-चढ़ाव से भरा है। कभी हम सफलता प्राप्त करते हैं तो कभी असफलता का सामना करना पड़ता है। लेकिन भगवद गीता हमें यह सिखाती है कि “सफलता और असफलता दोनों में समान भाव रखना चाहिए।”
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो व्यक्ति सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय में समभाव रखता है, वही सच्चा योगी है।
समभाव का अर्थ
समभाव का मतलब है –
👉 परिस्थितियों के अनुसार मन को स्थिर और संतुलित रखना।
👉 बाहरी घटनाओं से प्रभावित होकर खुशी या दुख में अतिरेक न करना।
उदाहरण:
- परीक्षा में अच्छे अंक आए तो अहंकार न करें, और यदि कम अंक आए तो निराश न हों।
- व्यापार में लाभ हुआ तो लालच न करें, और यदि हानि हुई तो टूट न जाएँ।
अर्जुन की स्थिति और कृष्ण का उपदेश
कुरुक्षेत्र युद्ध में अर्जुन सफलता-असफलता की चिंता में उलझ गया था। उसने सोचा कि यदि वह युद्ध जीतेगा तो अपने ही परिजनों को खो देगा, और यदि हारेगा तो अपमानित होगा।
तब कृष्ण ने कहा:
👉 “हे अर्जुन! तू सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समान रहकर अपने कर्तव्य का पालन कर।”
यही सच्चा योग है।
क्यों ज़रूरी है समभाव?
- मानसिक शांति – समभाव से मन स्थिर रहता है।
- निर्णय क्षमता बढ़ती है – संकट में भी सही निर्णय लिया जा सकता है।
- आत्मबल बढ़ता है – परिस्थितियाँ हमें विचलित नहीं कर पातीं।
- सच्ची सफलता – जीवन केवल परिणामों से नहीं, बल्कि संतुलित दृष्टिकोण से सफल होता है।
आधुनिक जीवन में महत्व
आज की प्रतिस्पर्धा भरी दुनिया में लोग सफलता के पीछे इतने पागल हो जाते हैं कि असफलता उन्हें तोड़ देती है। गीता की यह शिक्षा हमें सिखाती है कि –
- नौकरी न मिलने पर निराश न हों, बल्कि प्रयास जारी रखें।
- व्यवसाय में हानि हो जाए तो हार न मानें, बल्कि नई रणनीति अपनाएँ।
- सोशल मीडिया की तुलना से प्रभावित न हों, क्योंकि सच्ची खुशी भीतर से आती है।
समभाव कैसे विकसित करें?
- योग और ध्यान का अभ्यास – मन को नियंत्रित करने का सबसे प्रभावी साधन।
- निष्काम कर्म – केवल कर्म पर ध्यान देना, फल पर नहीं।
- आध्यात्मिक दृष्टि – हर घटना को ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करना।
- संतोष का अभ्यास – जो है उसमें संतुष्टि पाना।
प्रेरणादायक उदाहरण
- स्वामी विवेकानंद – सफलता या आलोचना से विचलित न होकर उन्होंने अपना कार्य जारी रखा।
- एपीजे अब्दुल कलाम – असफलताओं के बावजूद कभी हार नहीं मानी और भारत के “मिसाइल मैन” बने।
- अर्जुन – कृष्ण के उपदेश से समभाव अपनाकर ही युद्ध में डटा रहा।
समभाव का वास्तविक लाभ
- सुख और दुःख दोनों ही अस्थायी हैं।
- जो व्यक्ति दोनों को समान दृष्टि से देखता है, वही जीवन का सच्चा आनंद ले सकता है।
- समभाव से ही व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद गीता की चौथी शिक्षा “सफलता-असफलता में समभाव” हमें यह सिखाती है कि जीवन के उतार-चढ़ाव को स्वीकार करना ही वास्तविक बुद्धिमानी है।
👉 यदि हम सफलता पर गर्व और असफलता पर दुख से ऊपर उठ जाएँ, तो जीवन सरल, शांत और संतुलित हो जाएगा।
श्रीकृष्ण का संदेश:
“जो सुख-दुःख, हानि-लाभ और जय-पराजय में समान रहता है, वही सच्चा योगी है।”



