समता का भाव – भगवद गीता की शिक्षा

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भगवद गीता में श्रीकृष्ण का एक गहन उपदेश है – “समता ही सच्ची योग स्थिति है।”
समता का अर्थ है सुख-दुःख, लाभ-हानि, विजय-पराजय और मित्र-शत्रु में समान दृष्टि रखना।
👉 यह शिक्षा हमें जीवन की परिस्थितियों में संतुलन और धैर्य बनाए रखने का मार्ग दिखाती है।


समता का वास्तविक अर्थ

  • समता का मतलब यह नहीं कि जीवन में भेदभाव या भावनाएं न हों, बल्कि यह कि हम परिस्थितियों के अधीन न हों।
  • समता वह अवस्था है जहाँ मन किसी भी स्थिति में विचलित नहीं होता।
  • यह योगी की सर्वोच्च पहचान है।

अर्जुन और समता का भाव

अर्जुन युद्धभूमि में रिश्तों के मोह और भावनाओं से विचलित था।
श्रीकृष्ण ने उसे सिखाया कि सुख-दुःख, हानि-लाभ और जय-पराजय को समान मानकर ही कर्तव्य निभाना चाहिए।
👉 यही समता का भाव अर्जुन को युद्ध करने की शक्ति देता है।

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गीता में समता पर उपदेश

  1. स्थिर बुद्धि का लक्षण – जो सुख-दुःख में सम है, वही स्थिर बुद्धि वाला है।
  2. योग की परिभाषा – समत्वं योग उच्यते (अध्याय 2, श्लोक 48) – “समता को ही योग कहा गया है।”
  3. आसक्ति का नाश – समता से व्यक्ति मोह-माया और अहंकार से मुक्त हो जाता है।
  4. शांति का मार्ग – समता से ही सच्चा मानसिक और आत्मिक सुख प्राप्त होता है।

श्रीकृष्ण के श्लोक (अध्याय 2, श्लोक 38)

👉 “हे अर्जुन! सुख-दुःख, हानि-लाभ और विजय-पराजय को समान समझकर युद्ध करो। इस प्रकार तुम पाप से मुक्त रहोगे।”


आधुनिक जीवन में समता का महत्व

आज के समय में प्रतिस्पर्धा, आर्थिक असमानता और भौतिक इच्छाएं व्यक्ति को असंतुलित बना देती हैं।

  • समता का भाव हमें तनाव, क्रोध और ईर्ष्या से बचाता है।
  • यह हमें किसी भी परिस्थिति में धैर्यवान और शांत बनाए रखता है।
  • समता से परिवार और समाज में संतुलन और सद्भावना बनी रहती है।

प्रेरणादायक उदाहरण

  • स्वामी विवेकानंद – उन्होंने कहा, “सुख और दुःख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, ज्ञानी व्यक्ति इनसे प्रभावित नहीं होता।”
  • महात्मा बुद्ध – जिन्होंने समता और मध्यम मार्ग का उपदेश दिया।
  • संत कबीर – जिन्होंने कहा, “दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय।”

समता का अभ्यास

  1. ध्यान और प्राणायाम – मन को संतुलित रखने का श्रेष्ठ उपाय।
  2. सकारात्मक दृष्टिकोण – हर परिस्थिति को शिक्षा के रूप में देखना।
  3. आसक्ति का त्याग – लोगों और वस्तुओं से अत्यधिक लगाव न रखना।
  4. नियमित आत्मचिंतन – प्रतिदिन विचार करना कि क्या मैं हर स्थिति में समभाव रख पा रहा हूँ।

निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद गीता की नौवीं शिक्षा “समता का भाव” हमें बताती है कि जीवन में सच्ची शांति और योग तभी संभव है जब हम परिस्थितियों में संतुलित रहें।
👉 समता से ही व्यक्ति स्थिर बुद्धि, धैर्य और आत्मिक आनंद प्राप्त करता है।

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श्रीकृष्ण का संदेश:
“समत्वं योग उच्यते – समता ही योग है।”

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