माया और मोह से मुक्ति – भगवद गीता की शिक्षा

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मानव जीवन में सबसे बड़ी बाधा है मोह और माया का बंधन
भगवद गीता में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति मोह-माया में बंधा रहता है, वह सत्य और आत्मज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकता।
👉 सच्ची मुक्ति तभी संभव है जब हम मोह, लालच और आसक्ति से ऊपर उठें।


माया और मोह का अर्थ

  • माया – संसार की अस्थायी वस्तुएँ और सुख, जो हमें वास्तविक सत्य से दूर करती हैं।
  • मोह – रिश्तों, वस्तुओं और सुखों के प्रति अति-आसक्ति, जो दुःख का कारण बनती है।

अर्जुन का मोह

अर्जुन युद्धभूमि में खड़ा होकर अपने संबंधियों, गुरुजनों और प्रियजनों को देखकर मोहग्रस्त हो गया।
उसने कहा:
👉 “हे कृष्ण! मैं अपने स्वजनों का वध कैसे कर सकता हूँ?”
यह मोह उसे अपने धर्म और कर्तव्य से दूर कर रहा था।

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श्रीकृष्ण का उपदेश

श्रीकृष्ण ने समझाया:

  1. आत्मा अमर है – शरीर अस्थायी है, इसलिए उसके लिए शोक मत करो।
  2. मोह केवल दुःख का कारण है।
  3. धर्म और कर्तव्य को मोह से ऊपर रखो।
  4. सच्चा ज्ञान तभी प्राप्त होता है जब मोह का त्याग किया जाए।

गीता का श्लोक (अध्याय 2, श्लोक 71)

👉 “विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निरममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥”
(जो सभी कामनाओं को त्यागकर, स्पृहा, ममता और अहंकार से मुक्त होकर जीवन जीता है, वही शांति को प्राप्त करता है।)


मोह-माया से मुक्ति के लाभ

  • मानसिक शांति और संतुलन
  • नकारात्मक भावनाओं से मुक्ति
  • आत्मज्ञान की प्राप्ति
  • जीवन में स्थिरता और आनंद

आधुनिक जीवन में मोह का प्रभाव

आज का मनुष्य धन, पद, प्रतिष्ठा और संबंधों के मोह में फँस कर दुःखी है।

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  • प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या का कारण भी यही मोह है।
  • जीवन की वास्तविक शांति बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि भीतर की आत्मा में है।
  • मोह छोड़कर संतोष और आत्मज्ञान की ओर बढ़ना ही गीता का संदेश है।

प्रेरणादायक उदाहरण

  • राजा जनक – राजमहल में रहते हुए भी मोह-मुक्त होकर ज्ञानी कहलाए।
  • भीष्म पितामह – जिन्होंने महाभारत युद्ध में धर्म और कर्तव्य को मोह से ऊपर रखा।
  • सन्यासी संत – जिन्होंने माया और मोह त्यागकर सत्य की खोज की।

मोह-मुक्ति का अभ्यास

  1. ध्यान और साधना – मन को स्थिर और शुद्ध करना।
  2. अस्थायीता का चिंतन – समझें कि सब कुछ नश्वर है।
  3. निस्वार्थ कर्म – मोह के बिना कर्म करना।
  4. संतोष का अभ्यास – जो है उसमें संतुष्टि रखना।

निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद गीता की बारहवीं शिक्षा “माया और मोह से मुक्ति” हमें बताती है कि जब तक मनुष्य मोह और माया में बंधा रहेगा, वह सच्चे सुख और आत्मज्ञान को नहीं पा सकता।
👉 मुक्ति का मार्ग है – मोह का त्याग और आत्मा का बोध।

श्रीकृष्ण का संदेश:
“जो मोह को त्यागता है, वही सच्चा ज्ञानी और मुक्त कहलाता है।”

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