अनासक्ति का महत्व – भगवद गीता की शिक्षा

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मानव जीवन का सबसे बड़ा बंधन है आसक्ति (Attachment) – वस्तुओं, व्यक्तियों और परिणामों से जुड़ाव।
भगवद गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि सच्चा योगी वही है जो कर्म तो करता है, परंतु उसके परिणाम से आसक्त नहीं होता।
👉 यही है अनासक्ति (Detachment) की शिक्षा।


आसक्ति और अनासक्ति का अर्थ

  • आसक्ति (Attachment) – जब मनुष्य अपने कार्य, रिश्तों या वस्तुओं से इतना जुड़ जाता है कि उनके बिना जी नहीं पाता।
  • अनासक्ति (Detachment) – जब मनुष्य कर्म करता है लेकिन उसके परिणाम, लाभ-हानि और सुख-दुःख से ऊपर उठ जाता है।

अर्जुन की दुविधा

अर्जुन युद्ध के परिणामों को लेकर चिंतित था।
वह सोच रहा था –
👉 “अगर मैंने अपने प्रियजनों को मार दिया तो मैं कैसे सुखी रहूँगा?”
यह आसक्ति उसे धर्मपालन से रोक रही थी।

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श्रीकृष्ण का उपदेश

श्रीकृष्ण ने कहा:

  1. कर्म करो, लेकिन फल की चिंता मत करो।
  2. सुख-दुःख, लाभ-हानि, विजय-पराजय में समान रहो।
  3. अनासक्ति से ही मनुष्य योग और मोक्ष को प्राप्त करता है।

गीता का श्लोक (अध्याय 2, श्लोक 47)

👉 “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥”
(तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में कभी नहीं। कर्मफल की इच्छा से कर्म मत करो और अकर्म में आसक्त मत हो।)


अनासक्ति के लाभ

  • मन की शांति और स्थिरता
  • असफलता और हानि से दुःख कम होना
  • आत्मबल और साहस की वृद्धि
  • जीवन में संतुलन और संतोष

आधुनिक जीवन में महत्व

आज की दुनिया में हर कोई परिणाम और सफलता पर निर्भर है।

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  • अगर परिणाम अच्छा न हो तो निराशा आ जाती है।
  • यही आसक्ति हमें चिंता, अवसाद और तनाव देती है।
    👉 गीता सिखाती है कि हमें केवल अपना श्रेष्ठ प्रयास करना चाहिए, परिणाम ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए।

प्रेरणादायक उदाहरण

  • स्वामी विवेकानंद – “कर्म कर, फल की चिंता मत कर” का संदेश दिया।
  • महात्मा बुद्ध – अनासक्ति को शांति और निर्वाण का मार्ग बताया।
  • योगी संत – जिन्होंने संसार में रहकर भी आसक्ति से मुक्त जीवन जिया।

अनासक्ति का अभ्यास कैसे करें

  1. ध्यान और साधना – मन को स्थिर करना।
  2. फल की बजाय कर्म पर ध्यान – अपना श्रेष्ठ प्रयास करें।
  3. सुख-दुःख को समान मानना – परिस्थिति चाहे जैसी हो, संतुलित रहना।
  4. समर्पण भाव – हर परिणाम को ईश्वर की इच्छा मानना।

निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद गीता की चौदहवीं शिक्षा “अनासक्ति का महत्व” हमें बताती है कि कर्म तो करना है, लेकिन उसके परिणाम से बंधना नहीं है।
👉 जब इंसान अनासक्ति का अभ्यास करता है, तभी वह सच्ची शांति, ज्ञान और मोक्ष को प्राप्त करता है।

श्रीकृष्ण का संदेश:
“कर्म करो, लेकिन आसक्ति मत रखो।”

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