गंगा ने अपने ही बच्चों को क्यों डुबोया? भीष्म कैसे जीवित बचे – महाभारत की अद्भुत कथा

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Image Credit: Aaj Tak
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भारतीय महाकाव्य महाभारत अनगिनत कहानियों, रहस्यों और जीवन-दर्शन का भंडार है। इसके हर पात्र का जीवन मानवीय भावनाओं, कर्तव्यों और धर्म के गहरे प्रश्नों को सामने लाता है। इस महाकाव्य का एक अत्यंत मार्मिक और रहस्यमयी प्रसंग है—गंगा और उनके पुत्र भीष्म की कथा।

यह प्रश्न हमेशा से लोगों को उलझन में डालता रहा है कि आखिर देवी गंगा ने अपने ही सात बच्चों को जन्म के तुरंत बाद क्यों डुबो दिया? और कैसे आठवां पुत्र जीवित रहकर आगे चलकर भीष्म पितामह बना? इस लेख में हम इस पूरी घटना को विस्तार से समझेंगे।


🌊 1. राजा शांतनु और गंगा का मिलन

हस्तिनापुर के महान सम्राट राजा शांतनु एक बार गंगा नदी के तट पर पहुंचे। वहां उन्होंने एक दिव्य और अनुपम सुंदरी को देखा, जो वास्तव में देवी गंगा थीं। शांतनु ने तुरंत ही उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा।

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गंगा ने विवाह के लिए सहमति तो दे दी, लेकिन एक शर्त रखी:
👉 “आप मुझे कभी भी किसी कार्य के लिए प्रश्न नहीं करेंगे। यदि आपने मुझसे सवाल किया, तो मैं आपको छोड़कर चली जाऊंगी।”

राजा शांतनु ने प्रेमवश यह शर्त मान ली और दोनों का विवाह हुआ।


👶 2. सात बच्चों का जन्म और वियोग

गंगा और शांतनु का जीवन प्रारंभिक दिनों में सुखद रहा। गंगा ने पहला पुत्र जन्मा, परंतु जैसे ही शिशु पैदा हुआ, उन्होंने उसे नदी में बहा दिया।

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राजा शांतनु यह देखकर व्यथित तो हुए, लेकिन वचन के कारण मौन रहे। यही घटना सात बार दोहराई गई।

👉 हर बार गंगा अपने शिशु को लेकर गंगा नदी की लहरों में समर्पित कर देतीं।
👉 और हर बार शांतनु का हृदय टूटता, परंतु वे कुछ पूछ नहीं पाते।

हस्तिनापुर की प्रजा भी इस रहस्य से दुखी थी कि राजा के संतान क्यों जीवित नहीं रहती।


❓ 3. आठवें पुत्र पर टूटा मौन

जब आठवां पुत्र पैदा हुआ, गंगा उसे भी लेकर नदी की ओर चलीं। इस बार राजा शांतनु का धैर्य जवाब दे गया।

उन्होंने गंगा को रोकते हुए कहा:
👉 “तुम मेरे हृदय पर बार-बार प्रहार कर रही हो। अब मैं चुप नहीं रह सकता। क्यों मेरे बच्चों को बार-बार नदी में बहा रही हो?”

यही सवाल करना गंगा की शर्त का उल्लंघन था।


🌌 4. गंगा का रहस्य उजागर

राजा शांतनु के प्रश्न पर गंगा ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया और कहा:

  • “मैं वास्तव में गंगा नदी की अधिष्ठात्री देवी हूं।”
  • “ये आठों बच्चे अष्ट वसु थे—आकाशीय देवता। इन्होंने ऋषि वशिष्ठ का अपमान किया था, जिसके कारण उन्हें पृथ्वी पर जन्म लेने का श्राप मिला।”
  • “मैंने वचन दिया था कि जैसे ही वे जन्म लेंगे, मैं उन्हें तुरंत मुक्ति दूंगी।”

इसीलिए सात वसुओं को जन्म के बाद गंगा नदी में समर्पित कर मुक्त कर दिया गया।


🔮 5. आठवां वसु – द्यू का श्राप

गंगा ने आगे बताया कि अष्ट वसुओं में सबसे बड़ा द्यू था, जो मुख्य दोषी था।

  • उसे लंबे समय तक पृथ्वी पर जीवन बिताने का श्राप मिला था।
  • वही आठवां पुत्र था, जिसे गंगा नदी में नहीं बहा सकती थीं।
  • यही बच्चा आगे चलकर देवव्रत कहलाया, जो बाद में भीष्म पितामह बने।

🧭 6. भीष्म का पालन-पोषण

गंगा आठवें पुत्र को लेकर स्वर्ग चली गईं और वहां देवताओं, ऋषियों व गुरुओं से उनका पालन-पोषण कराया।

  • उन्हें वेद, शास्त्र, राजनीति, शस्त्र और धर्मशास्त्र की शिक्षा मिली।
  • वे एक वीर योद्धा और महान धर्मज्ञ बने।

जब वे युवा हुए, तो गंगा उन्हें वापस राजा शांतनु के पास ले आईं और बोलीं:
👉 “यह तुम्हारा पुत्र देवव्रत है। अब इसे हस्तिनापुर की जिम्मेदारी सौंपो।”


⚔️ 7. देवव्रत से भीष्म बनने तक

देवव्रत का जीवन असाधारण था, पर उन्हें “भीष्म” नाम मिला उनकी महान प्रतिज्ञा से।

राजा शांतनु ने सत्यवती से विवाह करना चाहा, पर सत्यवती के पिता ने शर्त रखी कि उनके पुत्र ही हस्तिनापुर के उत्तराधिकारी बनेंगे।

देवव्रत ने अपने पिता की खुशी के लिए यह भीषण प्रतिज्ञा ली:
👉 “मैं आजीवन विवाह नहीं करूंगा और हस्तिनापुर के सिंहासन पर कभी अधिकार नहीं जमाऊंगा।”

उनकी यह प्रतिज्ञा इतनी कठोर और अद्वितीय थी कि देवताओं ने उन्हें “भीष्म” नाम दिया।


📜 8. महाभारत में भीष्म का योगदान

भीष्म पितामह महाभारत के सबसे प्रभावशाली और निर्णायक पात्र बने।

  • वे कुरु वंश के स्तंभ थे।
  • उन्होंने धर्म, न्याय और कर्तव्य का पालन जीवनभर किया।
  • युद्ध में उन्होंने कौरवों का साथ दिया, क्योंकि वे हस्तिनापुर के प्रति वचनबद्ध थे।
  • पांडवों और कौरवों दोनों के प्रति उनका स्नेह था, पर प्रतिज्ञा और कर्तव्य ने उन्हें कौरव पक्ष में बांधे रखा।

उनका जीवन दर्शाता है कि कैसे धर्म और प्रतिज्ञा का पालन कभी-कभी व्यक्तिगत भावनाओं से भी ऊपर हो जाता है।


🌟 9. भीष्म से मिलने वाली शिक्षाएँ

भीष्म पितामह का जीवन और गंगा की कथा हमें गहरे जीवन-संदेश देती है:

  1. वचन की महत्ता – वचन निभाने के लिए भीष्म ने अपना पूरा जीवन समर्पित किया।
  2. कर्तव्य सर्वोपरि है – व्यक्तिगत इच्छाएँ धर्म और कर्तव्य के सामने छोटी हो जाती हैं।
  3. मुक्ति और कर्मफल – गंगा ने सात वसुओं को मुक्ति दिलाई, पर द्यू को उसके कर्म का फल भुगतना पड़ा।
  4. धैर्य और त्याग – भीष्म का त्याग आने वाली पीढ़ियों के लिए उदाहरण है।

🧾 निष्कर्ष

महाभारत की यह कथा केवल एक मां और बच्चों की नहीं, बल्कि कर्म, श्राप, धर्म और प्रतिज्ञा की है। गंगा ने अपने बच्चों को इसलिए डुबोया क्योंकि वे श्रापित वसु थे जिन्हें मुक्ति दिलाना आवश्यक था।

आठवें पुत्र—भीष्म पितामह—का जीवन इस बात का प्रमाण है कि मानव जीवन केवल जन्म और मृत्यु का खेल नहीं, बल्कि एक गहरी जिम्मेदारी और उद्देश्य से भरा हुआ है।

पहला भाग : कैसे लिखी गई महाभारत की महागाथा? महर्षि व्यास ने मानी शर्त, तब लिखने को तैयार हुए थे श्रीगणेश
दूसरा भाग : राजा जनमेजय और उनके भाइयों को क्यों मिला कुतिया से श्राप, कैसे सामने आई महाभारत की गाथा?
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