महाभारत केवल एक युद्ध गाथा नहीं, बल्कि जीवन के सिद्धांतों का महासागर है। इस महाग्रंथ में अर्जुन का चरित्र विशेष स्थान रखता है। वे पांडवों में सबसे श्रेष्ठ धनुर्धर और युद्धकला के महान ज्ञाता थे। लेकिन गीता में उनकी भूमिका केवल योद्धा तक सीमित नहीं है। वे शिष्य, साधक और हर मानव के प्रतिनिधि हैं, जो जीवन के द्वंद्व, मोह और संशय से जूझते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश उन्हीं को दिया। इसलिए अर्जुन का जीवन हम सभी के लिए प्रेरणादायक है।
अर्जुन का परिचय
- जन्म: महाराज पांडु और रानी कुंती के पुत्र।
- गुरु: द्रोणाचार्य।
- विशेषता: अपराजेय धनुर्धर, ‘गुडाकेश’ (नींद पर विजय पाने वाले)।
- उपाधि: पार्थ (कुंतीपुत्र), धनंजय, सव्यसाची (दोनों हाथों से धनुष चलाने वाला)।
अर्जुन का व्यक्तित्व
1. अद्वितीय धनुर्धर
अर्जुन की एकाग्रता और साधना प्रसिद्ध है। द्रोणाचार्य ने जब विद्यार्थियों से कहा कि पेड़ पर बैठे पक्षी की आंख पर ध्यान लगाओ, तो केवल अर्जुन ने सही उत्तर दिया – “मैं केवल पक्षी की आंख देख रहा हूँ।” यही उनकी सफलता का रहस्य था।
2. धर्मप्रिय और विनम्र
युद्धकला में पारंगत होने के बावजूद अहंकार उनसे कोसों दूर था। वे अपने गुरु, बड़े भाई और भगवान श्रीकृष्ण का सम्मान करते थे।
3. मित्रता और भाईचारा
अर्जुन ने हमेशा अपने भाइयों के साथ धर्म और न्याय का साथ दिया। वे द्रौपदी के प्रति भी समर्पित रहे।
गीता में अर्जुन की भूमिका
कुरुक्षेत्र युद्ध शुरू होने से पहले, अर्जुन ने अपने ही रिश्तेदारों, गुरुजनों और मित्रों को शत्रु पक्ष में खड़ा देखा।
उनके हाथ कांपने लगे, शरीर शिथिल हो गया और धनुष नीचे गिर पड़ा।
👉 उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा:
“मैं अपने ही लोगों को मारकर क्या करूंगा? मुझे ऐसा राज्य, सुख और जीवन भी नहीं चाहिए।”
यह द्वंद्व और मोह केवल अर्जुन का नहीं, बल्कि हर इंसान के भीतर उठने वाला प्रश्न है। यही कारण है कि गीता के श्रोता के रूप में अर्जुन मानवता का प्रतीक हैं।
अर्जुन और श्रीकृष्ण का संवाद
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा –
- आत्मा अमर है, शरीर नश्वर है।
- क्षत्रिय का धर्म है कि वह न्याय के लिए युद्ध करे।
- मोह और आसक्ति मनुष्य को धर्म से भटका देती है।
- निस्वार्थ कर्म और भक्ति से ही मुक्ति मिलती है।
👉 अर्जुन ने अंततः शरणागति स्वीकार करते हुए कहा –
“करिष्ये वचनं तव” (मैं आपका कहा करूंगा)।
अर्जुन से मिलने वाली शिक्षाएँ
1. संशय हर इंसान के जीवन में आता है
कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन की स्थिति हर व्यक्ति की वास्तविकता को दर्शाती है। जीवन के कठिन फैसलों में अक्सर हम भी असमंजस में पड़ जाते हैं।
2. मार्गदर्शन की आवश्यकता
जैसे अर्जुन ने श्रीकृष्ण को सारथी और मार्गदर्शक बनाया, वैसे ही जीवन में सही गुरु या प्रेरणा आवश्यक है।
3. शरणागति और विश्वास
जब अर्जुन ने अहंकार त्यागकर ईश्वर की शरण ली, तभी उन्हें धर्म का सच्चा मार्ग मिला।
4. कर्तव्य सर्वोपरि है
अर्जुन ने गीता के उपदेशों को स्वीकार कर धर्म युद्ध लड़ा। यह दिखाता है कि व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
आधुनिक जीवन में अर्जुन की प्रासंगिकता
- करियर और जीवन के निर्णय: जब कठिन विकल्प सामने हों, अर्जुन का उदाहरण हमें साहस देता है।
- मानसिक स्वास्थ्य: संशय और अवसाद से उबरने के लिए सही मार्गदर्शन जरूरी है।
- लीडरशिप और टीमवर्क: अर्जुन ने हमेशा अपने भाइयों के साथ मिलकर धर्म की रक्षा की।
- आध्यात्मिक साधना: जैसे अर्जुन ने श्रीकृष्ण की शरण ली, वैसे ही हमें भी ईश्वर या उच्च आदर्श का सहारा लेना चाहिए।
अर्जुन से जुड़े प्रेरणादायक प्रसंग
- द्रौपदी स्वयंवर – अर्जुन ने मछली की आंख भेदकर द्रौपदी का वरण किया।
- किरात अर्जुनीयम – अर्जुन ने भगवान शिव से पाशुपतास्त्र प्राप्त किया।
- कुरुक्षेत्र युद्ध – गीता का उपदेश प्राप्त कर धर्मयुद्ध का नेतृत्व किया।
अर्जुन के कथन (Gita Quotes of Arjuna)
- “न योत्स्य इति गोविन्द।” – प्रारंभ में युद्ध से पीछे हटना।
- “शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।” – श्रीकृष्ण से शिष्यत्व स्वीकार करना।
- “करिष्ये वचनं तव।” – अंततः गुरु के आदेश का पालन।
निष्कर्ष
अर्जुन केवल एक योद्धा नहीं थे। वे हर उस इंसान का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो जीवन में उलझन, मोह और संशय का सामना करता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश उन्हें देकर सम्पूर्ण मानवता को जीवन का शाश्वत संदेश दिया।
👉 अर्जुन हमें सिखाते हैं कि –
- शंका स्वाभाविक है, लेकिन समाधान ईश्वर और धर्म में है।
- कर्तव्य सर्वोपरि है, चाहे परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों न हो।
- सच्चा शिष्य वही है, जो अहंकार त्यागकर गुरु और ईश्वर की शरण ले।



