भीष्म पितामह – त्याग, प्रतिज्ञा और धर्म का अद्भुत प्रतीक

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महाभारत का हर पात्र अपने आप में विशेष है, लेकिन भीष्म पितामह का स्थान अद्वितीय है। वे हस्तिनापुर की राजगद्दी के सबसे बड़े संरक्षक और महाभारत युद्ध के समय तक जीवित सबसे वरिष्ठ योद्धा थे। उनका जीवन त्याग, प्रतिज्ञा, निष्ठा और धर्म का आदर्श उदाहरण है।

भगवद गीता में भीष्म सीधे श्रोता नहीं हैं, लेकिन युद्धभूमि में उनका अस्तित्व बहुत महत्वपूर्ण है। वे कौरवों की ओर से लड़े, फिर भी अंत तक धर्म और न्याय की व्याख्या करते रहे।


परिचय

  • जन्म नाम: देवव्रत
  • पिता: महाराज शांतनु
  • माता: गंगा
  • उपाधि: भीष्म (भयंकर प्रतिज्ञा लेने वाले)
  • विशेषता: इच्छा मृत्यु (Ichchha Mrityu) का वरदान – वे अपनी इच्छा से ही मृत्यु को प्राप्त कर सकते थे।

भीष्म का व्यक्तित्व

1. प्रतिज्ञा के धनी

देवव्रत ने अपने पिता शांतनु के सुख के लिए यह प्रतिज्ञा ली कि वे कभी राजगद्दी पर नहीं बैठेंगे और आजीवन ब्रह्मचारी रहेंगे। इस कठोर व्रत ने ही उन्हें भीष्म नाम दिलाया।

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2. न्यायप्रिय और निष्पक्ष

भीष्म हमेशा सत्य और धर्म के मार्ग पर चलते थे। वे हस्तिनापुर की गद्दी के रक्षक बने, लेकिन कभी अन्याय का समर्थन नहीं किया।

3. महान योद्धा

वे अजेय योद्धा और अद्वितीय धनुर्धर थे। महाभारत युद्ध में भीष्म के सामने कोई योद्धा टिक नहीं पाता था।


भीष्म पितामह और कुरुक्षेत्र युद्ध

भीष्म कौरवों की ओर से युद्ध में उतरे, क्योंकि वे हस्तिनापुर के प्रति बंधे हुए थे। लेकिन उनका मन कौरवों के अन्यायपूर्ण आचरण से सहमत नहीं था।

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  • उन्होंने युद्ध से पहले युधिष्ठिर को आशीर्वाद दिया कि “तुम्हारी विजय होगी।”
  • युद्ध के पहले दस दिनों तक उन्होंने पांडवों को कड़ा संघर्ष दिया।
  • अंत में अर्जुन ने शिखंडी को आगे रखकर भीष्म को बाणों से भेद डाला, क्योंकि भीष्म ने शिखंडी पर शस्त्र उठाने से मना किया था।

भीष्म की शिक्षाएँ

1. त्याग और निष्ठा

अपने पिता की खुशी के लिए अपना राजपद और विवाह का अधिकार त्याग देना, त्याग की चरम सीमा है।

2. प्रतिज्ञा का पालन

भीष्म ने जीवनभर अपनी प्रतिज्ञा निभाई। यह हमें सिखाता है कि वचनबद्धता ही सच्चे चरित्र का परिचायक है।

3. धर्म की व्याख्या

भीष्म ने मृत्युशैया पर शांतिपर्व और अनुशासनपर्व के माध्यम से धर्म, राजनीति और जीवन के गहन सिद्धांत बताए।

4. कर्तव्यनिष्ठा

भले ही वे जानते थे कि कौरव अन्याय कर रहे हैं, फिर भी हस्तिनापुर के प्रति अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटे।


भीष्म और गीता का संबंध

युद्धभूमि में जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर युद्ध से पीछे हटना चाहते थे, तो यह स्थिति भीष्म के अस्तित्व से भी जुड़ी थी। अर्जुन अपने प्रिय पितामह को मारने की कल्पना से टूट गए थे।

👉 इसलिए गीता का उपदेश केवल अर्जुन को ही नहीं, बल्कि भीष्म की उपस्थिति में दिए गए उस महान धर्मसंकट का समाधान भी था।


आधुनिक जीवन में भीष्म की प्रासंगिकता

  • प्रतिज्ञा का मूल्य: वचन निभाना आज के समय में भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
  • परिवार और समाज के प्रति समर्पण: भीष्म की तरह हमें भी समाज और परिवार के उत्थान के लिए समर्पित रहना चाहिए।
  • धर्म और नीति: भीष्म का जीवन सिखाता है कि सत्ता या शक्ति से बढ़कर नीति और धर्म का पालन आवश्यक है।
  • कर्तव्य बनाम व्यक्तिगत इच्छा: कभी-कभी हमें अपनी इच्छाओं का त्याग करके कर्तव्य निभाना पड़ता है।

प्रेरणादायक प्रसंग

  1. गंगा पुत्र देवव्रत का भीष्म बनना – कठोर प्रतिज्ञा से इतिहास रचना।
  2. राजगद्दी के रक्षक – हर स्थिति में हस्तिनापुर की रक्षा करना।
  3. शरशैया पर धर्मोपदेश – मृत्यु से पहले तक धर्म और नीति का ज्ञान देना।

भीष्म पितामह के कथन (उद्धरण)

  • “धर्म ही श्रेष्ठ है, वही संसार का आधार है।”
  • “राजा का कर्तव्य है कि वह प्रजा की रक्षा करे।”
  • “सत्य ही धर्म है, और धर्म ही ईश्वर का स्वरूप है।”

निष्कर्ष

भीष्म पितामह का जीवन त्याग, नीति और धर्म का जीवंत उदाहरण है। वे दिखाते हैं कि शक्ति का वास्तविक उपयोग धर्म की रक्षा और कर्तव्य पालन में है।
उनकी प्रतिज्ञा, निष्ठा और शरशैया पर दिए गए उपदेश आज भी मानवता के लिए मार्गदर्शन हैं।

👉 भीष्म हमें सिखाते हैं कि –

  • वचन की रक्षा जीवन से भी बढ़कर है।
  • धर्म ही स्थायी है, बाकी सब नश्वर है।
  • कर्तव्य पालन ही सच्चे योद्धा और नेता की पहचान है।
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