📝 अध्याय का सारांश
इस अध्याय में कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि का वर्णन है।
जब अर्जुन युद्ध के लिए खड़े होते हैं तो वे देखते हैं कि उनके सामने उनके अपने गुरु, भाई, मित्र और संबंधी खड़े हैं।
मोह और करुणा से ग्रस्त होकर अर्जुन का हृदय द्रवित हो जाता है और वे अपने धनुष को नीचे रखकर युद्ध करने से इंकार कर देते हैं।
🌸 प्रमुख श्लोक एवं अर्थ
श्लोक 1
धृतराष्ट्र उवाच ।
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥१॥
👉 भावार्थ:
धृतराष्ट्र पूछते हैं – हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध के इच्छुक मेरे पुत्रों और पाण्डु पुत्रों ने क्या किया?
श्लोक 28–30
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ॥२८॥
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥२९॥
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ॥३०॥
👉 भावार्थ:
अर्जुन कहते हैं – हे कृष्ण! अपने ही स्वजनों को युद्ध के लिए खड़ा देखकर
मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मुख सूख रहा है, शरीर कांप रहा है, और गाण्डीव धनुष हाथ से छूट रहा है।
✅ निष्कर्ष
इस अध्याय का मुख्य संदेश है कि मोह और आसक्ति व्यक्ति को अपने कर्तव्य से रोक सकते हैं।
अर्जुन का विषाद यह दिखाता है कि जब मन असंतुलित हो जाता है, तो सही निर्णय लेना कठिन हो जाता है।
यही से श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देना आरंभ करते हैं, जो आगे के अध्यायों में विस्तार से मिलता है।
