धृतराष्ट्र – अंधे राजा और महाभारत के मौन दर्शक

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महाभारत की कथा में धृतराष्ट्र एक महत्वपूर्ण किंतु दुखद पात्र हैं।
वे हस्तिनापुर के अंधे राजा थे, जिन्होंने अपनी कमजोरी, मोह और पुत्रमोह के कारण धर्म और न्याय की रक्षा नहीं कर पाए।
उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि अंधत्व केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक भी हो सकता है


परिचय

  • नाम: धृतराष्ट्र
  • वंश: कुरुवंश, हस्तिनापुर के राजा
  • विशेषता: जन्म से अंधे, परंतु शक्तिशाली और विद्वान
  • भूमिका: महाभारत युद्ध के समय कौरवों के पिता और राज्य का राजा

धृतराष्ट्र का व्यक्तित्व

1. दुखद जीवन की शुरुआत

धृतराष्ट्र जन्म से ही अंधे थे। इस कारण वे राजा बनने के योग्य नहीं माने गए और राज्य उनके छोटे भाई पांडु को दे दिया गया।

2. पुत्रमोह में बंधे हुए

उनके सौ पुत्र (कौरव) हुए, जिनमें दुर्योधन सबसे बड़ा था।
धृतराष्ट्र अपने पुत्रों के प्रति अत्यधिक आसक्त थे और उनके दोष भी नहीं देख पाते थे।

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3. निष्क्रिय राजा

हालाँकि वे राज्य के राजा थे, लेकिन वास्तविक निर्णयों पर उनका नियंत्रण कम था।
दुर्योधन और शकुनि ने उनके मोह और कमजोरी का फायदा उठाया।


धृतराष्ट्र की भूमिका महाभारत में

  • पांडवों और कौरवों के बीच हुए संघर्षों में धृतराष्ट्र हमेशा निष्क्रिय रहे।
  • जब द्रौपदी का अपमान हुआ, तब भी वे निर्णायक कदम नहीं उठा पाए।
  • कुरुक्षेत्र युद्ध में उन्होंने युद्धभूमि नहीं देखी।
  • युद्ध का संपूर्ण विवरण संजय ने उन्हें सुनाया।
  • उन्होंने युद्ध रोकने की कोई ठोस कोशिश नहीं की।

धृतराष्ट्र और भगवद गीता

  • गीता का संवाद अर्जुन और कृष्ण के बीच हुआ, जिसे संजय ने दिव्य दृष्टि से देखा और धृतराष्ट्र को सुनाया।
  • गीता की शुरुआत भी धृतराष्ट्र के प्रश्न से होती है –
    “धृतराष्ट्र उवाच – धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः…”
  • यहीं से गीता का अद्भुत ज्ञान प्रवाहित हुआ।

धृतराष्ट्र से मिलने वाली शिक्षाएँ

  1. अत्यधिक मोह विनाशकारी है – पुत्रमोह के कारण उन्होंने धर्म और न्याय की अनदेखी की।
  2. निर्णय लेने में कमजोरी – परिस्थितियों में सही कदम न उठाने से विनाश होता है।
  3. नेतृत्व में निष्पक्षता जरूरी है – राजा को केवल अपने परिवार नहीं, बल्कि प्रजा का भी ध्यान रखना चाहिए।
  4. अंधत्व केवल नेत्रों का नहीं – सही और गलत में भेद न कर पाना भी मानसिक अंधत्व है।

आधुनिक जीवन में धृतराष्ट्र का आदर्श (और चेतावनी)

  • नेतृत्व की भूमिका – परिवार, संस्था या समाज में नेतृत्व करते समय निष्पक्ष होना आवश्यक है।
  • संस्कारों पर ध्यान – केवल भौतिक सुख-सुविधाएँ नहीं, बल्कि बच्चों को धर्म और नीति के मार्ग पर चलाना चाहिए।
  • निर्णायक बनें – कठिन परिस्थितियों में सही और साहसी निर्णय ही भविष्य बचा सकता है।

प्रेरणादायक प्रसंग

  1. संजय से प्रश्न – गीता की शुरुआत धृतराष्ट्र के प्रश्न से होती है, जिसने मानवता को दिव्य उपदेश दिलाए।
  2. मौन दर्शक – उन्होंने देखा कि पुत्र गलत मार्ग पर हैं, परंतु अपनी कमजोरी के कारण चुप रहे।
  3. युद्ध का परिणाम – अंततः धृतराष्ट्र ने सब कुछ खो दिया – पुत्र, राज्य और गौरव।

निष्कर्ष

धृतराष्ट्र का जीवन हमें यह सिखाता है कि नेत्रों का अंधत्व जीवन में उतना खतरनाक नहीं है, जितना विवेक और नीति का अंधत्व
वे राजा होकर भी अपने निर्णयों में असफल रहे।
उनकी सबसे बड़ी भूल थी – पुत्रमोह में धर्म की अनदेखी।
इसलिए उनका चरित्र हमें चेतावनी देता है कि जीवन में सत्य, धर्म और निष्पक्षता से कभी समझौता नहीं करना चाहिए।

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