द्रोणाचार्य – अद्वितीय गुरु और धर्मसंकट में उलझा योद्धा

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महाभारत में द्रोणाचार्य केवल एक महान योद्धा ही नहीं, बल्कि अद्वितीय गुरु भी थे।
वे कुरुवंश के राजकुमारों – पांडवों और कौरवों – के शिक्षक रहे।
उनका जीवन आदर्श और धर्मसंकट का संगम है।
एक ओर वे अपने शिष्यों के प्रति समर्पित गुरु थे, वहीं दूसरी ओर पुत्र और मित्र के मोह में कई बार वे धर्म से भटक गए।


परिचय

  • नाम: द्रोणाचार्य (द्रोण)
  • पिता: महर्षि भारद्वाज
  • पुत्र: अश्वत्थामा
  • विशेषता: दिव्यास्त्रों और शस्त्रविद्या के आचार्य
  • भूमिका: पांडव और कौरव दोनों के गुरु, महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से सेनापति

द्रोणाचार्य का व्यक्तित्व

1. विद्या और तपस्या

द्रोणाचार्य महान तपस्वी और शस्त्रविद्या में निपुण थे।
उनका ज्ञान उन्हें ब्रह्मास्त्र जैसे दिव्यास्त्रों का स्वामी बनाता था।

2. गुरु का आदर्श

उन्होंने अपने सभी शिष्यों को समान रूप से शिक्षा दी।
अर्जुन को देखकर उन्होंने भविष्य में महान धनुर्धर बनने की संभावना देखी और उन्हें “श्रेष्ठ शिष्य” का आशीर्वाद दिया।

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3. धर्म और मोह के बीच संघर्ष

हालाँकि वे निष्पक्ष गुरु थे, लेकिन अपने पुत्र अश्वत्थामा और कौरवों के मोह में कई बार धर्म के मार्ग से डगमगा गए।


द्रोणाचार्य की भूमिका महाभारत में

  1. शिक्षक के रूप में
    • उन्होंने पांडव और कौरवों दोनों को शस्त्रविद्या सिखाई।
    • अर्जुन को देखकर कहा – “तू दुनिया का सबसे बड़ा धनुर्धर बनेगा।”
    • एकलव्य ने गुरु मानकर अभ्यास किया, लेकिन अंगूठा मांगकर द्रोणाचार्य ने अर्जुन की श्रेष्ठता बनाए रखी।
  2. महाभारत युद्ध में सेनापति
    • भीष्म पितामह के बाद द्रोणाचार्य कौरव सेना के सेनापति बने।
    • अपनी नीतियों और युद्धकौशल से पांडवों को बहुत हानि पहुँचाई।
  3. अभिमन्यु वध और धर्मसंकट
    • चक्रव्यूह रचना द्रोणाचार्य ने बनाई, जिसमें अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हुए।
    • यह प्रसंग उनकी धर्मनिष्ठा पर प्रश्न खड़ा करता है।
  4. मृत्यु का प्रसंग
    • युद्ध में जब उन्होंने सुना कि “अश्वत्थामा मारा गया” (अश्वत्थामा हाथी का), तो वे शस्त्र छोड़ ध्यानमग्न हो गए।
    • इसी अवस्था में द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न ने उनका वध कर दिया।

द्रोणाचार्य और गीता का संबंध

  • द्रोणाचार्य का उल्लेख गीता में भी हुआ है, जब श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्धभूमि पर उपस्थित सभी महायोद्धाओं का वर्णन कराते हैं।
  • अर्जुन उन्हें देखकर द्वंद्व में आ जाता है – “मेरे गुरु, पितामह और बंधु ही शत्रु पक्ष में खड़े हैं, मैं इन्हें कैसे मारूँ?”
  • यही अर्जुन का विषाद है, जो गीता उपदेश का आधार बनता है।

द्रोणाचार्य से मिलने वाली शिक्षाएँ

  1. गुरु का महत्व – शिक्षा के बिना कोई भी महान नहीं बन सकता।
  2. निष्पक्षता और पक्षपात – एक गुरु को समान दृष्टि रखनी चाहिए।
  3. धर्मसंकट जीवन का हिस्सा है – मोह और कर्तव्य के बीच संघर्ष हर किसी को झेलना पड़ता है।
  4. अन्याय का समर्थन न करें – चाहे मोह कितना भी हो, अन्याय के पक्ष में खड़ा होना विनाशकारी है।

आधुनिक जीवन में द्रोणाचार्य का आदर्श

  • शिक्षा का महत्व – ज्ञान और विद्या ही वास्तविक संपत्ति है।
  • गुरु का सम्मान – जीवन में गुरु के मार्गदर्शन से ही उन्नति संभव है।
  • निर्णय क्षमता – कठिन समय में सही निर्णय लेने की क्षमता होना आवश्यक है।
  • मोह से सावधान रहें – पुत्र, परिवार या पद के मोह में सही और गलत का विवेक न खोएं।

प्रेरणादायक प्रसंग

  1. अर्जुन को आशीर्वाद – अर्जुन के कौशल को देखकर उन्होंने उसे श्रेष्ठ शिष्य माना।
  2. एकलव्य प्रसंग – विद्या के प्रति एकलव्य की श्रद्धा ने द्रोणाचार्य को अचंभित किया।
  3. अश्वत्थामा मोह – पुत्र के प्रति मोह उनके जीवन की सबसे बड़ी कमजोरी बन गया।

निष्कर्ष

द्रोणाचार्य का जीवन ज्ञान, आदर्श और धर्मसंकट का मिश्रण है।
वे एक महान गुरु और योद्धा थे, लेकिन मोह और कर्तव्य के बीच संघर्ष में कई बार धर्म से समझौता कर बैठे।
उनका चरित्र हमें यह सिखाता है कि सच्चा गुरु वह है जो न्याय और धर्म के मार्ग पर अडिग रहे, चाहे परिस्थिति कैसी भी हो

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