महाभारत के युद्ध का विस्तृत वर्णन अगर आज हमें मिलता है, तो उसका श्रेय संजय को जाता है।
वे केवल एक सारथि या दूत नहीं थे, बल्कि भगवान वेदव्यास से प्राप्त दिव्य दृष्टि वाले अद्वितीय पात्र थे।
उनकी दृष्टि ने ही धृतराष्ट्र और संसार को भगवद् गीता का दिव्य ज्ञान सुनाया।
परिचय
- नाम: संजय
- भूमिका: धृतराष्ट्र के सारथि और विश्वासपात्र
- विशेषता: वेदव्यास द्वारा दी गई दिव्य दृष्टि, जिसके माध्यम से उन्होंने महाभारत युद्ध का सीधा वर्णन किया
- महत्व: भगवद गीता का प्रथम श्रोता
संजय का व्यक्तित्व
1. निष्ठावान सेवक
संजय धृतराष्ट्र के प्रति पूर्ण निष्ठा रखते थे। वे उनकी सेवा करते हुए निष्पक्ष रूप से सत्य प्रस्तुत करते थे।
2. दिव्य दृष्टि वाले द्रष्टा
वेदव्यास ने उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान की थी। इसी कारण वे महाभारत के युद्ध को बिना युद्धभूमि में गए देख सकते थे।
3. निष्पक्ष वक्ता
संजय ने युद्ध का वर्णन करते समय कभी भी पक्षपात नहीं किया। उन्होंने पांडव और कौरव – दोनों की स्थिति स्पष्ट रूप से बताई।
संजय की भूमिका महाभारत में
- जब युद्ध शुरू हुआ, तब धृतराष्ट्र ने उनसे युद्ध का हाल पूछना शुरू किया।
- संजय ने प्रत्यक्षदर्शी की तरह प्रत्येक युद्ध का विवरण दिया।
- उन्होंने ही धृतराष्ट्र को कौरवों की पराजय और पांडवों की विजय का संदेश सुनाया।
- संजय ने ही भगवद गीता के संवाद को धृतराष्ट्र तक पहुँचाया।
संजय और भगवद गीता
- गीता का प्रथम श्रवण धृतराष्ट्र ने नहीं, बल्कि संजय ने किया।
- अर्जुन और कृष्ण का संवाद दिव्य दृष्टि से देखने और सुनने वाले संजय ही प्रथम साक्षी और श्रोता बने।
- गीता के अंत में संजय कहते हैं – “जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं और जहाँ पार्थ धनुर्धर हैं, वहीं विजय, नीति, समृद्धि और धर्म है।”
यह वचन आज भी गीता का सार माना जाता है।
संजय की शिक्षाएँ
- निष्पक्षता – परिस्थितियाँ कैसी भी हों, सत्य और वास्तविकता बोलनी चाहिए।
- धैर्य और शांति – युद्ध जैसी भयावह स्थिति का भी संजय ने शांत मन से वर्णन किया।
- भगवान पर विश्वास – उन्होंने स्वयं गीता सुनकर यह स्वीकार किया कि अंततः विजय सत्य और धर्म की ही होती है।
आधुनिक जीवन में संजय का आदर्श
- पत्रकार और संवाददाता की भूमिका में संजय प्रेरणा हैं, क्योंकि उन्होंने सत्य को ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया।
- दृढ़ता और संतुलन – जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी संयम बनाए रखना सीखना चाहिए।
- सत्यनिष्ठा – किसी भी दबाव में झूठ न बोलना और सत्य के साथ रहना।
प्रेरणादायक प्रसंग
- वेदव्यास से वरदान – दिव्य दृष्टि मिलने पर भी संजय ने कभी उसका दुरुपयोग नहीं किया।
- गीता का श्रोता – उन्होंने सबसे पहले कृष्ण और अर्जुन का संवाद सुना और समझा।
- अंतिम सार – युद्ध समाप्त होने पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि धर्म और भगवान की शरण में रहने वालों की ही विजय होती है।
निष्कर्ष
संजय केवल धृतराष्ट्र के सारथि नहीं थे, बल्कि गीता के प्रथम श्रोता और सत्य के संदेशवाहक थे।
उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता हर परिस्थिति में सर्वोपरि है।
संजय की वाणी से ही आज हम गीता का दिव्य संदेश सुन पाते हैं, जो मानवता के लिए मार्गदर्शक है।



