भूमिका (Introduction)
भगवद गीता, जो महाभारत के भीष्म पर्व का एक हिस्सा है, केवल धार्मिक ग्रंथ ही नहीं बल्कि जीवन जीने की एक व्यावहारिक गाइड है। इसमें श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिए, वे हर युग और हर इंसान के लिए समान रूप से उपयोगी हैं। गीता की पहली और सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा है “धर्म का पालन करो”। यहाँ धर्म का अर्थ केवल धार्मिक कर्मकांड या पूजा-पाठ से नहीं है, बल्कि अपने कर्तव्यों (Duties) और जिम्मेदारियों को सही भावना से निभाना है।
धर्म का वास्तविक अर्थ
अक्सर लोग धर्म को केवल किसी विशेष धर्म (जैसे हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई) से जोड़ते हैं। लेकिन गीता में धर्म का मतलब है –
👉 स्वधर्म – यानी वह कर्तव्य जो आपकी स्थिति, भूमिका और जिम्मेदारी के अनुसार आप पर लागू होता है।
उदाहरण:
- छात्र का धर्म है शिक्षा प्राप्त करना।
- माता-पिता का धर्म है बच्चों का पालन-पोषण करना।
- सैनिक का धर्म है देश की रक्षा करना।
कृष्ण ने अर्जुन को यही समझाया कि उसका धर्म क्षत्रिय होने के नाते रणभूमि से भागना नहीं, बल्कि धर्मयुद्ध करना है।
अर्जुन का भ्रम और कृष्ण का समाधान
कुरुक्षेत्र के युद्ध में जब अर्जुन ने देखा कि उसे अपने ही गुरुजनों, भाइयों और रिश्तेदारों से लड़ना है, तो वह विचलित हो गया। उसने धनुष नीचे रख दिया और युद्ध से पीछे हटने का विचार किया।
तब श्रीकृष्ण ने कहा:
👉 “हे अर्जुन! तेरा धर्म है युद्ध करना। यदि तू इससे पीछे हटेगा तो यह तेरा अधर्म होगा और तुझे पाप लगेगा।”
यह उपदेश हमें सिखाता है कि जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटना चाहिए।
क्यों ज़रूरी है धर्म का पालन?
- जीवन में स्पष्टता – जब हम अपने धर्म को पहचानते हैं तो हमें जीवन का उद्देश्य समझ आता है।
- संतुलित समाज – हर व्यक्ति यदि अपना धर्म निभाए तो समाज में संतुलन बना रहता है।
- आत्मिक शांति – धर्म पालन से हमें मानसिक शांति और आत्मसंतोष मिलता है।
- कर्म और परिणाम – गीता कहती है कि केवल धर्मानुसार कर्म करने से ही अच्छे परिणाम मिलते हैं।
धर्म बनाम अधर्म
गीता यह भी बताती है कि धर्म और अधर्म में अंतर समझना जरूरी है।
- धर्म: सत्य, न्याय, कर्तव्य और लोक-कल्याण की दिशा में किया गया कर्म।
- अधर्म: स्वार्थ, भय, लालच और मोह में आकर किया गया कर्म।
उदाहरण:
- यदि कोई डॉक्टर पैसे के लालच में मरीज का सही इलाज न करे, तो यह अधर्म है।
- लेकिन यदि वह ईमानदारी से हर मरीज का इलाज करता है, तो यह उसका धर्म है।
आधुनिक जीवन में धर्म का पालन
गीता की यह शिक्षा सिर्फ महाभारत काल तक सीमित नहीं है। आज भी हर इंसान के लिए उतनी ही प्रासंगिक है।
- एक कर्मचारी का धर्म है कि वह ईमानदारी से अपना काम करे।
- एक व्यापारी का धर्म है कि वह ग्राहकों को सही वस्तु दे और धोखाधड़ी न करे।
- एक नागरिक का धर्म है कि वह देश के नियम-कानूनों का पालन करे।
- एक नेता का धर्म है कि वह जनता के कल्याण के लिए कार्य करे, न कि केवल अपने लाभ के लिए।
यदि हर व्यक्ति अपने-अपने धर्म का पालन करे तो समाज से भ्रष्टाचार, अन्याय और अव्यवस्था काफी हद तक समाप्त हो जाएगी।
धर्म का पालन कैसे करें?
- स्वयं को पहचानें – सबसे पहले जानें कि आपकी भूमिका और जिम्मेदारी क्या है।
- कर्तव्य को प्राथमिकता दें – निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर कर्तव्य निभाएँ।
- सत्य और न्याय को आधार बनाएं – निर्णय लेते समय हमेशा सही और न्यायपूर्ण मार्ग चुनें।
- निर्भय होकर कर्म करें – परिणाम की चिंता किए बिना धर्म का पालन करें।
प्रेरणादायक उदाहरण
- महात्मा गांधी – उनका धर्म था सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलना। उन्होंने इस कर्तव्य का पालन जीवन भर किया।
- सुभाषचंद्र बोस – उनका धर्म था भारत की स्वतंत्रता, जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया।
- स्वामी विवेकानंद – उनका धर्म था समाज में ज्ञान और जागरूकता फैलाना।
ये सभी उदाहरण गीता के संदेश को ही जीवन में लागू करते हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद गीता की पहली शिक्षा – “धर्म का पालन करो” हमें यह सिखाती है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल जीना नहीं, बल्कि सही तरीके से जीना है। हर व्यक्ति यदि अपने धर्म को समझकर उसका पालन करे, तो न केवल उसका जीवन सफल होगा बल्कि समाज और देश भी मजबूत और समृद्ध बनेगा।
श्रीकृष्ण का संदेश आज भी उतना ही जीवंत है:
👉 “अपने कर्तव्य से कभी पीछे मत हटो, क्योंकि धर्म पालन ही सच्ची भक्ति है।”



