भगवद गीता में श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया कि ईश्वर किसी एक मंदिर, मूर्ति या स्थान तक सीमित नहीं हैं।
👉 वे हर जीव, हर कण और पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त हैं।
जब मनुष्य यह समझ लेता है कि ईश्वर सर्वत्र है, तब उसके भीतर करुणा, नम्रता और समर्पण का भाव जागृत होता है।
ईश्वर की सर्वव्यापकता का अर्थ
- ईश्वर केवल किसी विशेष रूप में नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि में विद्यमान हैं।
- वे सभी प्राणियों में समान रूप से रहते हैं।
- ईश्वर की उपस्थिति हमारे हर कर्म, विचार और भाव में है।
गीता में श्रीकृष्ण का उपदेश
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा:
👉 “मैं ही सृष्टि का कारण हूँ, और सब कुछ मुझमें ही स्थित है।”
उन्होंने यह भी कहा कि भक्त चाहे किसी भी रूप में पूजा करे, वह अंततः उन्हीं तक पहुँचता है।
गीता का श्लोक (अध्याय 9, श्लोक 22)
👉 “अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥”
(जो लोग एकाग्र भाव से मेरी उपासना करते हैं, उनके योग-क्षेम की मैं स्वयं रक्षा करता हूँ।)
ईश्वर सर्वत्र है – इसका भावार्थ
- हमें हर जीव में ईश्वर का दर्शन करना चाहिए।
- भेदभाव और अहंकार समाप्त हो जाता है।
- सच्ची भक्ति का अर्थ है – हर स्थान और हर प्राणी में ईश्वर को देखना।
आधुनिक जीवन में महत्व
- जब हम हर किसी में ईश्वर देखते हैं, तो क्रोध, घृणा और हिंसा मिट जाती है।
- यह सोच इंसान को निस्वार्थ सेवा और परोपकार की ओर प्रेरित करती है।
- धार्मिक भेदभाव खत्म होता है और मानवता का भाव मजबूत होता है।
प्रेरणादायक उदाहरण
- मीरा बाई – उन्होंने हर जगह केवल कृष्ण को ही देखा और भक्ति में लीन रहीं।
- स्वामी विवेकानंद – उन्होंने कहा, “जिस जीव की सेवा करते हो, उसमें ईश्वर का ही दर्शन करो।”
- महात्मा गांधी – उन्होंने हर प्राणी में ईश्वर का अंश माना और अहिंसा का पालन किया।
अभ्यास – ईश्वर को सर्वत्र देखने के लिए
- सकारात्मक दृष्टि अपनाएँ – हर परिस्थिति को ईश्वर की इच्छा मानें।
- सेवा भाव – दूसरों की निस्वार्थ मदद करें।
- ध्यान और नामस्मरण – मन को ईश्वर के भाव से जोड़ें।
- भेदभाव का त्याग – जाति, धर्म और रूप के भेद को मिटाएँ।
निष्कर्ष (Conclusion)
भगवद गीता की तेरहवीं शिक्षा “ईश्वर सर्वत्र है” हमें सिखाती है कि परमात्मा किसी स्थान या रूप तक सीमित नहीं हैं।
👉 वे हर जीव और हर कण में उपस्थित हैं।
जो यह सत्य समझ लेता है, उसका जीवन भक्ति, करुणा और शांति से भर जाता है।
श्रीकृष्ण का संदेश:
“मुझमें ही सब है, और मैं ही सबमें हूँ।”



