भक्ति का महत्व – भगवद गीता की शिक्षा

3 Min Read
हमारे टेलीग्राम चैनल से जुड़ें Join Now


भगवद गीता का अंतिम और सबसे गहन संदेश है – भक्ति (Devotion)
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि ज्ञान, योग और कर्म का सर्वोच्च फल भक्ति में है।
👉 केवल सच्ची भक्ति के द्वारा मनुष्य ईश्वर से जुड़कर मोक्ष प्राप्त कर सकता है।


भक्ति का अर्थ

  • भक्ति का मतलब केवल पूजा-पाठ नहीं है।
  • भक्ति वह भाव है जिसमें मनुष्य अपने अहंकार को छोड़कर पूर्ण रूप से ईश्वर में समर्पित हो जाता है।
  • यह प्रेम, विश्वास और समर्पण का मार्ग है।

अर्जुन और भक्ति का रहस्य

अर्जुन जब संशय और दुःख में डूबा था, तब श्रीकृष्ण ने कहा:
👉 “तुम केवल मेरी शरण आओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा।”
यही शरणागति (Surrender) का भाव है, जो भक्ति का आधार है।


गीता का श्लोक (अध्याय 18, श्लोक 66)

👉 “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥”
(सभी धर्मों को त्यागकर मेरी शरण आओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, चिंता मत करो।)

ये भी पढ़ें:
गंगा ने अपने ही बच्चों को क्यों डुबोया? भीष्म कैसे जीवित बचे – महाभारत की अद्भुत कथा
August 23, 2025

भक्ति के प्रकार

  1. सगुण भक्ति – ईश्वर को रूप, मूर्ति या प्रतीक के रूप में मानना।
  2. निर्गुण भक्ति – निराकार ईश्वर की आराधना करना।
  3. प्रेम भक्ति – ईश्वर को मित्र, माता-पिता या प्रियतम मानकर उनसे प्रेम करना।
  4. ज्ञान मिश्रित भक्ति – ज्ञान और साधना के साथ ईश्वर से जुड़ना।

भक्ति का महत्व

  • भक्ति से मन को शांति और संतोष मिलता है।
  • यह अहंकार को समाप्त कर देती है।
  • मनुष्य हर परिस्थिति में ईश्वर पर भरोसा करना सीखता है।
  • भक्ति से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।

आधुनिक जीवन में भक्ति

  • आज के तनावपूर्ण जीवन में भक्ति मन को स्थिर और सकारात्मक बनाती है।
  • भक्ति हमें असफलताओं से टूटने नहीं देती।
  • यह हर इंसान में करुणा और प्रेम जगाती है।
    👉 भक्ति ही जीवन को सरल, संतोषपूर्ण और सार्थक बनाती है।

प्रेरणादायक उदाहरण

  • मीरा बाई – जिन्होंने कृष्ण भक्ति में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।
  • हनुमान जी – जिन्होंने रामभक्ति में अमरत्व प्राप्त किया।
  • छोटे-छोटे संत – जिन्होंने केवल ईश्वर का नाम लेकर आनंद पाया।

भक्ति का अभ्यास कैसे करें

  1. नामस्मरण और भजन – हर दिन ईश्वर का स्मरण करें।
  2. प्रार्थना – अपने भाव और कृतज्ञता ईश्वर को अर्पित करें।
  3. सेवा – दूसरों की सेवा को ही ईश्वर की सेवा मानें।
  4. पूर्ण समर्पण – हर सुख-दुःख को ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करें।

निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद गीता की पंद्रहवीं शिक्षा “भक्ति का महत्व” हमें यह बताती है कि सच्ची मुक्ति का मार्ग केवल भक्ति से ही संभव है।
👉 ज्ञान, कर्म और योग सभी का अंतिम लक्ष्य भक्ति है।
जो व्यक्ति ईश्वर की शरण में जाकर भक्ति करता है, वही जीवन के सत्य को प्राप्त करता है।

श्रीकृष्ण का अंतिम संदेश:
“केवल मेरी भक्ति करो, मैं तुम्हें मुक्त कर दूँगा।”

Share This Article