योग का महत्व – भगवद गीता की शिक्षा

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भूमिका (Introduction)
भगवद गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। इसमें श्रीकृष्ण ने “योग” को जीवन का आधार बताया है। योग का अर्थ केवल आसन और प्राणायाम नहीं है, बल्कि मन, बुद्धि और आत्मा का संतुलन है।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा – “योग: कर्मसु कौशलम्” यानी योग ही कर्म में कुशलता है।


योग का वास्तविक अर्थ

“योग” का मतलब है – जुड़ना
👉 आत्मा का परमात्मा से जुड़ना।
👉 मन और शरीर का सामंजस्य।
👉 कर्म और भक्ति का संतुलन।

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गीता में योग को जीवन का मार्ग बताया गया है –

  • कर्मयोग – निष्काम कर्म करना।
  • ज्ञानयोग – आत्मा और ईश्वर के स्वरूप को समझना।
  • भक्तियोग – ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण।
  • ध्यानयोग – मन को एकाग्र करना।

अर्जुन और योग

जब अर्जुन मोह और शोक में उलझ गया, तब श्रीकृष्ण ने उसे योग की शरण में जाने को कहा। योग से ही मन शांत होता है और व्यक्ति सही निर्णय ले पाता है।


योग क्यों ज़रूरी है?

  1. मन की शांति – योग से मानसिक तनाव और चिंता दूर होती है।
  2. इंद्रिय-निग्रह – योग से इंद्रियों पर नियंत्रण आता है।
  3. कर्म में दक्षता – योग से व्यक्ति अपने कार्य को श्रेष्ठ ढंग से कर पाता है।
  4. आध्यात्मिक उन्नति – योग से आत्मा और परमात्मा का मिलन होता है।

गीता के अनुसार योगी की पहचान

  • जो सुख-दुःख में समान रहता है।
  • जो अपने कर्म को भगवान को अर्पण समझकर करता है।
  • जो इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है।
  • जो प्रेम, करुणा और दया से युक्त है।

आधुनिक जीवन में योग का महत्व

आज की भागदौड़, तनाव और भौतिकता से भरी दुनिया में योग पहले से कहीं अधिक आवश्यक है।

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  • विद्यार्थी योग से एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ा सकते हैं।
  • कर्मचारी योग से तनाव कम कर कार्यक्षमता बढ़ा सकते हैं।
  • समाज योग से आपसी भाईचारा और सामंजस्य प्राप्त कर सकता है।

प्रेरणादायक उदाहरण

  • स्वामी विवेकानंद – उन्होंने योग को पश्चिमी देशों तक पहुँचाया और बताया कि योग केवल साधना नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है।
  • महर्षि पतंजलि – योगसूत्र के माध्यम से योग को विज्ञान की तरह प्रस्तुत किया।
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी – उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस शुरू कर योग को विश्वव्यापी बना दिया।

योग का अभ्यास कैसे करें?

  1. दैनिक साधना – प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास।
  2. निष्काम कर्म – काम को पूजा मानकर करना।
  3. भक्ति भाव – हर कर्म में ईश्वर का स्मरण।
  4. संतुलित जीवनशैली – आहार, व्यवहार और विचार में सात्विकता।

निष्कर्ष (Conclusion)

भगवद गीता की पाँचवीं शिक्षा “योग का महत्व” हमें यह सिखाती है कि योग केवल साधना नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन दर्शन है। योग से ही मन, बुद्धि और आत्मा का संतुलन बनता है।

👉 योग हमें भौतिक दुनिया में रहते हुए भी आध्यात्मिक रूप से ऊँचा उठने की शक्ति देता है।

श्रीकृष्ण का संदेश:
“योगस्थ: कुरु कर्माणि” – योग में स्थित होकर ही अपने कर्म करो।

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